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मायावती ने राज्यसभा से दिया इस्तीफा

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राज्यसभा में मानसून सत्र के दौरान शुरुआत दूसरे दिन राज्यसभा में काफी हंगामा रहा इसी दौरान बसपा अध्यक्ष तथा उत्तर प्रदेश की सदस्य मायावती की बात नहीं सुने के आरोप लगाते हुए सदन छोड़ कर चली गईं उन्होंने अपना विरोध दर्ज करवाते हुए सदन की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है

मायावती सदन में सहारनपुर हिंसा के बारे में बोल रही थीं. इस दौरान अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे पी.जी. कुरियन. कुरियन ने मायावती को टोकते हुए बताया कि उनकी बोलने की समयसीमा पूरी हो चुकी है. इधर मायावती अपनी बात पूरी करने पर अड़ी हुईं थीं. इस बात पर माहौल गर्म हो गया. बीच बचाव के लिए शरद यादव और रामगोपाल यादव खड़े हुए. लेकिन तब तक मायावती अपना आपा खो चुकी थीं. उन्होंने तैश में आकर कहा, “जब मैं अपने समाज की बात ही नहीं कह सकती तो ऐसी राज्यसभा के सदस्य बने रहने पर लानत है.” इसके बाद उन्होंने अपने इस्तीफे की घोषणा की और सदन से बाहर चली गईं

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सुबह से ही सदन में हंगामा जारी था. विपक्ष मोब लिंचिंग और मंदसौर किसान आन्दोलन पर स्थगन प्रस्ताव लाना चाह रहा था. स्थगन प्रस्ताव का मतलब होता है कि सदन की रूटीन कार्यवाही को रोक कर किसी गंभीर और जरुरी मुद्दे पर चर्चा करने का प्रस्ताव

मायावती के हालिया इस्तीफे को आप दो तरह से समझ सकते हैं. उनका राज्यसभा का कार्यकाल शुरू हुआ था अप्रैल 2012 में. इस हिसाब से उनका कार्यकाल 2018 में खत्म हो रहा है. ऐसे में एक साल पहले राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा देना कोई खास नुकसानदेह सौदा नहीं है. बशर्ते इसके बदले में उन्हें वो राजनीतिक फायदा हासिल हो सके जिसकी वो तलबगार हैं.

पिछले लोकसभा चुनाव के बाद दलितों की सारी सियासी नुमाइंदगी या तो बीजेपी के पक्ष में खड़ी हैं या फिर धराशायी हो चुकी हैं. रोहित वेमुला, अम्बेडकर स्टडी सर्किल, ऊना और अब सहारनपुर दलित आन्दोलन में नेतृत्व के स्तर पर एक छटपटाहट साफ़ महसूस की जा सकती है. विधानसभा चुनाव में हार के बाद मायावती को भी समझ में चुका है कि बेस वोट पर पकड़ मजबूत होना ही सोशल इंजनियरिंग जैसे प्रयोगों की जरुरी शर्त हैं. सहारनपुर में भीम आर्मी के उभार को उन्होंने खतरे की घंटी के तौर पर लिया. देर से ही सही बसपा की राजनीति पटरी पर लौट रही है. यह इस्तीफा और गुस्से का इजहार को इसकी बानगी के तौर पर देखा जा सकता है.

राजनीति को स्टंट की तरह देखने के चश्मे को उतार कर किनारे रख देते हैं. इसके बाद सदन के सारे कायदे भी उसके बगल में रख देते हैं. सवाल यह है कि अगर कोई सदस्य दलितों के खिलाफ हो रही हिंसा के मामले पर दो मिनट ज्यादा बोल भी देता तो इससे संसदीय परम्परा पर कौन सा ऐतिहासिक प्रभाव पड़ जाता. जिस संसद पर हमने ये जिम्मेदारी सौंपी है कि वो हर नागरिक के बोलने के अधिकार की रक्षा करेगी, उसी संसद की एक माननीय सदस्य इस वजह से इस्तीफा दे देती हैं क्योंकि उन्हें बोलने नहीं दिया जा रहा. यह एक लोकतंत्र के लिए सही संकेत नहीं हैं.

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